देहरादून नाबालिग लड़कियों का अपहरण मामला प्रदेश में एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। हाल ही में थाना पटेल नगर क्षेत्र में दो नाबालिग बालिकाओं के लापता होने की घटना सामने आई, जिसने प्रशासन और समाज दोनों को झकझोर कर रख दिया है।
इस मामले में उत्तराखंड बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ गीता खन्ना ने संज्ञान लेते हुए इसे अत्यंत गंभीर बताया है। पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई करते हुए एक 16 वर्षीय बालिका को बरामद कर लिया गया है, लेकिन 14 वर्षीय दूसरी बालिका अब भी लापता है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, लापता बालिका के बिहार में होने की आशंका जताई जा रही है।
मामले की जांच के दौरान यह भी सामने आया है कि दोनों बालिकाओं को बाहरी राज्य के कुछ युवकों द्वारा बहला-फुसलाकर ले जाया गया हो सकता है। यह तथ्य प्रदेश में बढ़ रही आपराधिक गतिविधियों को लेकर गंभीर संकेत देता है। डॉ गीता खन्ना ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि अधिकतर अपराध बाहरी व्यक्तियों द्वारा किए जा रहे हैं और बस्तियों में रहने वाले प्रवासी परिवारों की महिलाएं और बच्चे अधिकतर हिंसा का शिकार हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि पुलिस द्वारा इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का सत्यापन किया जाना अत्यंत आवश्यक है। इससे अपराधों पर नियंत्रण पाया जा सकता है और संदिग्ध गतिविधियों की पहचान समय रहते की जा सकती है।
इस घटना में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया है कि दोनों बालिकाएं विद्यालय नहीं जा रही थीं। यह स्थिति शिक्षा प्रणाली पर भी सवाल खड़े करती है कि स्कूल छोड़ चुके बच्चों की पहचान समय पर क्यों नहीं हो रही है। डॉ गीता खन्ना ने इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई और कहा कि ड्रॉपआउट बच्चों को पुनः शिक्षा से जोड़ने के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे।
हाल ही में देहरादून के रिस्पना क्षेत्र में तीन बहनों के घर छोड़कर जाने का मामला भी सामने आया था। इस प्रकार की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि बच्चों और अभिभावकों के बीच संवाद की कमी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। कई बार बच्चे मानसिक दबाव या पारिवारिक परिस्थितियों के कारण घर छोड़ने जैसे कदम उठा लेते हैं, जो आगे चलकर गंभीर अपराधों का कारण बन सकता है।
डॉ गीता खन्ना ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें समाज, विद्यालय और अभिभावकों की भी समान भागीदारी आवश्यक है। विद्यालयों को जागरूकता अभियानों में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि बच्चों को सही मार्गदर्शन मिल सके। वहीं, अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ नियमित संवाद बनाए रखना चाहिए, जिससे वे उनकी समस्याओं को समझ सकें और समय रहते समाधान कर सकें।
उन्होंने आम जनता से यह अपील भी की कि इस प्रकार की घटनाओं के संबंध में सोशल मीडिया पर किसी भी प्रकार की अपुष्ट या भ्रामक जानकारी साझा न करें। इससे न केवल जांच प्रभावित होती है बल्कि समाज में अनावश्यक भय और भ्रम भी फैलता है।
आयोग ने इस मामले में पुलिस विभाग को निर्देश दिए हैं कि जांच को त्वरित और निष्पक्ष तरीके से पूरा किया जाए तथा शीघ्र रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। साथ ही, राज्यभर में बच्चों की सुरक्षा को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की भी तैयारी की जा रही है।
देहरादून नाबालिग लड़कियों का अपहरण मामला यह स्पष्ट करता है कि समाज को अब सतर्क होने की आवश्यकता है। बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और मानसिक स्थिति पर विशेष ध्यान देकर ही इस प्रकार की घटनाओं को रोका जा सकता है।

